Thursday, December 21, 2017

देश की लुटिया

हे भगवन !
घाट पे बैठे देख रहा हूँ, देख के माथा ठोक रहा हूँ l
बीच मजधार बहती जाये l
देश की लुटिया है, और उसमे छेद नज़र आये l

किसने नोट खाये, किसने वोट खाये l
किसने वोट के लिए नोट खाये l
जेब झाडूं तो सर चकराये l
वोट और नोट दोनों अपने, जब ये समझ में आये l
हो गया चोरी सब, सालों बाद कुछ याद नहीं अब l
अब तो चौकीदार भी हाथ उठाये, बोले चोरी हुई ही थी कब l
हो गया ये अच्छा तमाशा, एक डब्बा (टीवी) खूब दिखाये l
दिखा दिखा के हमारा तमाशा हम ही को, और पैसे कमाये l

अब तो तुम ही जानो प्रभु, हो सके तो मेरा मानो प्रभु l
एक आधा महाभारत फिर से हो जाये ?
देश की लुटिया है, और उसमे छेद नज़र आये l
कैसे कर के बस पार लग जाये l

Tuesday, September 27, 2016

बंटवारा


ज़मीन बँटी, नदियाँ  बँटीं,
बँट गये खेत पहाड़ । 
तेरा ही तो हक़ है बन्दे,
बाँट ले ये संसार । 

खींच लकीर, आसमान में,
रख हवा को, अपनी कमान में,
गौर रहे जो उनके परिन्दे,
जाएँ ना पर मार । 
इन सब पे बस तेरा हक़ है, 
बाँट ले ये संसार।

ध्यान रहे ! 
खुशियां न बाँटना, 
ग़म न बाँटना, 
कमज़ोर के लिए, दम न बाँटना,
रखना इनकी भरमार,
बँट - बँट के तो ख़त्म हो चुके, 
सारे दिल के तार । 
बाँट ले ग़र कुछ और रह गया,
बाँट ले ये संसार । 

Thursday, March 24, 2016

हँस ले ऎ दुनियाँ

हमारे घर को असमान की बुलंदियां सह न सकी
शगुफ्तगी की कमान
हाथों में मेरे रह न सकी |

सकता तो वो बरसता ही क्यूँ हम पर
छत हमारी ही क्यूँ गिरती हमपर |

कल ऐ दुनिया बारी हमारी आएगी
चेहरे पे हंसी हमारी आएगी,
कर लोगे क्या कर के दिखादो
एक दिन बारी हमारी आएगी, हमारी आएगी, हमारी आएगी |

Monday, March 14, 2016

असह्य दर्द (Unbearable pain - asahya dard)

आधे अधूरे से सच थे, पर झूठे न थे । 
तुम कुछ नाराज़ थे, पर रूठे न थे । 

एक अनजान झोंके ने, प्यार की डाल को ऐसा झूला दिया । 
लाख रोका, पर मुझको रुला दिया । 
आंधियाँ देखी थी कई उन्होंने,
पर चाहत के दरख़्त कभी टूटे न थे । 
तुम नाराज़ थे, पर रूठे न थे । 

इतने दर्द को देख आते जाते हर झोंके ने पूछा, "है सलामत ?"
जब कहते न बना तो जाने दिया उनको । 
कभी मेरे दिल के घाव इतने अनूठे न थे । 

नया क्या है इस टीस में क्यों पूछते हो । 
बेशक दिल दुखा, बेशक रोये । 
लोगों को पत्थर में भगवान मिलता है,
तो सोचते हैं किस्मत वाले हैं । 
मुझ अभागे को देख लो,
मैंने भगवान को वापस पत्थर बना दिया ।

मुड़ कर इतनी जल्दी तुम चल दिए,
अभी आँखों के आंसू ठीक से फूटे न थे । 
तुम कुछ नाराज़ थे, पर रूठे न थे । 

Friday, March 4, 2016

दर्द ढृढ़

दर्द है परीक्षा ।
दर्द है प्रतीक्षा ।
परीक्षित तू प्रतीक्षाशाली बन ।
प्रतीक्षित तू परीक्षाशाली बन ।
बोल मानव क्या है तेरी इच्छा ।

करले ढृढ़ खुद को ।
देख ले समय की सीमा को ।
नांप ले दूरी की परिसीमा को ।

जमा के दिल को ।
कर पत्थर झुलसने दे शरीर को ।
बुझ गयी आँखें तो क्या ।
कब तक बादल ढकेंगे रवि किरण को।

राह तेरी है ।
कौन ढोएगा तुझे उसपार फिर।
थकने दे अपने कदमों को ।

बोल मानव क्या है तेरी इच्छा ।
क्या करेगा अगले परीक्षा की प्रतीक्षा ।
क्या करेगा पूरी प्रतीक्षा की परीक्षा ।

Monday, February 29, 2016

कसक

मुस्कुराते अरमान जागते सोते हैं ।
कुछ अधूरे अनकहे से होते हैं ।
पसरे आसमान को एक टुक ताके पपीहा ।
पर बादल भी हर बार कहाँ रोते हैं ।

झाँक झरोखे की तारीफ़ कैसे करूँ ।
आप कभी कभार ही वहां होते हैं ।
ज़िद कर रहा हूँ आपसे ।
चलें मेरे साथ राह दर राह ।
मत पूछें 'कहाँ जाना है' हमसे ।
क्यूंकि कुछ राह के ही ठिकाने होते हैं ।

जलता हूँ उस हवा से ।
चिढ़ाती है जो हमें जान बूझ कर ।
कहे सांस बन आपके दिल तक है पहुँचती ।
जवाब देने की कसक पे मरहम लगा दें एक बार ।
बोल दें हमें एक बार ।
के हम आपके दिल में हमेशा होते हैं ।

Wednesday, February 24, 2016

ज़िन्दगी के रास्ते

ज़िन्दगी आसान रास्ते ढूंढती है ।
कई डगर चले हम ।
कई शहर चले हम ।
देखा तमाशा बायस्कोप जैसा ।
तेज़ रफ़्तार थी ।
चकाचौंध रोशनियों से सराबोर ,
हर ओर का समां था ।
चाह ऐसी थी के आसमां ही पा लेंगे ।
चलते रहे बस उस तरफ ,
जिधर की दिशा से आँखें सम्मोहित थीं ।
कांटे भी लगे , चोटें भी।
पर तब कुछ न होश था ।
थी तो सिर्फ एक होड़ और
धड़कनों में जोश था ।

दिन वो था जब ठोकर लगी , आँखें खुलीं ,
जैसे नींद से जागे हम और देखा ,
आसमां अब भी बित्ते भर दूर था ।
खूब रोये गाये थे हम ।
दिल को भी समझाए थे हम ।
के बस बोहोत हुआ ,
चलो वापस इस वीराने से ।

कुछ चले हम थके प्यासे से ।
कहीं एक पेड़ दिखा तो वहीँ रुक लिए ।
पेशानी से हटाया पसीना और
की आँखें बंद तो ये एहसास हुआ के
लौटना कितना दूभर है , और
ज़िन्दगी अब भी आसान रास्ते ढूंढ़ती है ।