Thursday, February 18, 2016

मतदाता की भावना

मरता क्या ना करता ।
चला में पैदल जहाँ थी भीड़, नंगे पाँव
पहनने को ना थी एक चप्पल ।

गिरा एक पानी भरे खड्डे में
ना थी ढंग की सड़क ।

उठा चला और लगा कतार में पसीने से तर ।
ना थी सर पर छाँव ।

रंगा कर अपनी उंगली काली सोचा मैं खड़ा ।
मतपत्र देख मेरा मत, "मत, मत कर" कहने लगा ।
एक कुआँ तो एक खाई ।
आँखें बंद कर प्रभु का नाम ले दबा दी एक बटन ।
मरता क्या ना करता ।

चुन लिया एक कुआँ वो भी सूखा
ना पानी है ना खाना ।
सिलसिला ये ही चला हर पाँच वर्ष
हर मतदान बस अगले की उमीद दे पता है
और कुछ नई करता
मैं बेचारा मरता क्या ना करता? 

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