चादर की सिलवटों में छुपे, चन्द सच से हैं ।
इनमे उतनी ही सच्चाई है,
जितनी मैंने दिल को कुरेद कर बताई थी तुम्हें ।
छोड़ तो दिया तुमने उन्हें वहीं पर ,
उन्ही चादर की सिलवटों में ।
बेख़याल बेसुध मेरी करवटों ने
संजोये रखा है उन सिलवटों को ,
क्यूंकि वो अब भी मेरे लिए सच ही हैं ।
लफ्ज़ ही हमनफ़ज़ हैं अब तो ।
कभी वो मुझे बहलाते हैं, कभी मैं उनको ।
औने पौने ख़याल, टूटी फूटी बातें हैं ।
बेमतलब हैं या मुझे समझ नहीं आते हैं ।
उनका मतलब भी तो छुपा है वहीं ,
उन्हीं चादर की सिलवटों में ।
इनमे उतनी ही सच्चाई है,
जितनी मैंने दिल को कुरेद कर बताई थी तुम्हें ।
छोड़ तो दिया तुमने उन्हें वहीं पर ,
उन्ही चादर की सिलवटों में ।
बेख़याल बेसुध मेरी करवटों ने
संजोये रखा है उन सिलवटों को ,
क्यूंकि वो अब भी मेरे लिए सच ही हैं ।
लफ्ज़ ही हमनफ़ज़ हैं अब तो ।
कभी वो मुझे बहलाते हैं, कभी मैं उनको ।
औने पौने ख़याल, टूटी फूटी बातें हैं ।
बेमतलब हैं या मुझे समझ नहीं आते हैं ।
उनका मतलब भी तो छुपा है वहीं ,
उन्हीं चादर की सिलवटों में ।
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