Friday, February 5, 2016

शुरुआत

हर सोच की एक शुरुआत होती है, पर माला की नहीं क्यूंकि हम उसके सिरे को नहीं खोज पाते ।
वैसे देखा जाये तो सोच के सिरे भी नहीं होते । उसके आगे और पीछे भी होता है । या तो कोई सच या कोई ख़याल ।

एक तरह से देखा जाये तो एक माला की भी शुरुआत होती है । वो पहला मोती या वो पहली लड़ी । जैसे जैसे मोतियों को पिरोते जाओ माला बड़ी होती है पर उसके फिर भी सिरे नहीं पनपते । माला कितनी बड़ी होगी ये मोती नहीं उसका धागा करता है । ठीक उसी तरह सोच कितनी दूर जाएगी ये सोच के सच और ख़याल नहीं उसे सोचने वाला तय करता है ।

काफी पेचीदा लगते हैं ये दो शब्द मुझे 'सोच' और 'माला' अब इसकी पेचीदगी भी तो शब्द नहीं मेरे ख़याल ही तय करते हैं । खैर पेचीदे हों या सुलझे एक बात तो है । इन दोनों शब्दों को एक साथ इस्तेमाल करना एक कश्मकश दर्शाता है । हर इंसान हर वक़्त किसी न किसी कश्मकश में रहता है । एक नमूना देता हूँ । सोचिए कभी तो आपके साथ ऐसा हुआ होगा कि आप किसी को बहुत समझाने कोशिश की  हो और वो आपकी बात समझे ही नहीं । तो आपको दुःख और कश्मकश एक साथ होता है । 
उसी पर एक शेर अर्ज़ है ।

'हमने तो खत में पूरी ज़िन्दगी लिख डाली, तुम थे के मज़्मूं ही न समझ पाये ।'

अब मुझे ही देख लीजिये कुछ ऐसा हुआ मेरे साथ के मैंने लिखना बस छोड़ ही दिया था । हाँ, कुछ दोस्त मज़ाक में ये ज़रूर बोलते थे के अच्छा ही हुआ, हमारे कान और दिमाग बच गए । पर मेरी सोच माला बड़ी होती गयी । अब मैं इस दुविधा में के फिर से कुछ लिखूं या नहीं । अब उसी का इलाज मुझे ये मिला कि मैं यहाँ अपने सोच की माला आज की भाषा में 'डाउनलोड' कर देता हूँ । अगर आपको पसंद आये तो शौक से इस माला के और मोती खोजिए और अगर ना आये तो 'इंटरनेट' या अंतरजाल पे पड़े कई सरफिरि चीज़ों कि तरह हँसिये और भूल जाइये । धन्यवाद ।

No comments:

Post a Comment