इक जाम सा ही बना है मेरे हाथों में ।
मानो इक काम सा ही बना है मेरी सूनी रातों में ।
इक अनकही मुराद, इक अनसुनी फ़रियाद ।
उनका मुक़ाम सा ही बना है तुम्हारी यादों में ।
जाम ख़त्म होते हैं, काम ख़त्म होते हैं ।
पर यादें नहीं हैं जाती ।
उन्हीं को लिख लिख कर,
इक पैग़ाम सा बना है इन कागज़ातों में ।
मानो इक काम सा ही बना है मेरी सूनी रातों में ।
इक अनकही मुराद, इक अनसुनी फ़रियाद ।
उनका मुक़ाम सा ही बना है तुम्हारी यादों में ।
जाम ख़त्म होते हैं, काम ख़त्म होते हैं ।
पर यादें नहीं हैं जाती ।
उन्हीं को लिख लिख कर,
इक पैग़ाम सा बना है इन कागज़ातों में ।
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