Monday, February 8, 2016

याद

इक जाम सा ही बना है मेरे हाथों में ।
मानो इक काम सा ही बना है मेरी सूनी रातों में ।

इक अनकही मुराद, इक अनसुनी फ़रियाद ।
उनका मुक़ाम सा ही बना है तुम्हारी यादों में ।

जाम ख़त्म होते हैं, काम ख़त्म होते हैं ।
पर यादें नहीं हैं जाती ।

उन्हीं को लिख लिख कर,
इक पैग़ाम सा बना है इन कागज़ातों में ।

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