Sunday, February 7, 2016

एक भटके राही की सोच

कहीं बेराह चले जा रहे हैं, कहीं बेराह चले जा रहे हैं ।
कुछ सामान तो है कंधे पर, है जाना कहाँ ये सुध नहीं ।
कहीं बेराह चले जा रहे हैं, कहीं बेराह चले जा रहे हैं ।

कहीं रौशनी सी दिखी थी कभी ।
चले काफी उसे देख पर ये न सोचा,
के वो मन्ज़िल का दिया नहीं, कोई जुगनू था ।
साथ चलता वो तो बस, कुछ चुराए किरणों की पोटली था ।
जब थक कर मद्धिम हो चली उसकी रौशनी,
तो कह दिया उसने,
राही तू चल मैं यहीं  रुकता हूँ ।

पर आगे तो अन्धेरा था ।
सो फिर से रोती किस्मत लिए, गुमराह चले जा रहे हैं ।
कहीं बेराह चले जा रहे हैं, कहीं बेराह चले जा रहे हैं ।

कभी धुंधलका सा हुआ तो रुक कर खोला सामानों का पिटारा ।
एक टूटी कलम, एक रुकी घडी,
और स्याही से सने कुछ पन्ने थे ।
काफी सोचा हमने पर समझ न आया,
के बीते लम्हों के चीथड़े किस चाह लिए जा रहे हैं ।
कहीं बेराह चले जा रहे हैं, कहीं बेराह चले जा रहे हैं ।

कभी कभी आँखें भी भरतीं हमारी।
"रोने से भला न होगा।"
कह कर दायीं आँख से फिसलते एक आँसू को रोका ।
आखिर था भी कौन वहाँ उनको पोछने वाला ?
ये सवाल भी आया था, अपने नमक के दाग लगे रुमाल को देख ।
सो बंद कर अपनी पोटली और आँखें भी ।
हर राह चुने जा रहे हैं ।
कहीं बेराह चले जा रहे हैं, कहीं बेराह चले जा रहे हैं ।

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