Tuesday, September 27, 2016

बंटवारा


ज़मीन बँटी, नदियाँ  बँटीं,
बँट गये खेत पहाड़ । 
तेरा ही तो हक़ है बन्दे,
बाँट ले ये संसार । 

खींच लकीर, आसमान में,
रख हवा को, अपनी कमान में,
गौर रहे जो उनके परिन्दे,
जाएँ ना पर मार । 
इन सब पे बस तेरा हक़ है, 
बाँट ले ये संसार।

ध्यान रहे ! 
खुशियां न बाँटना, 
ग़म न बाँटना, 
कमज़ोर के लिए, दम न बाँटना,
रखना इनकी भरमार,
बँट - बँट के तो ख़त्म हो चुके, 
सारे दिल के तार । 
बाँट ले ग़र कुछ और रह गया,
बाँट ले ये संसार । 

Thursday, March 24, 2016

हँस ले ऎ दुनियाँ

हमारे घर को असमान की बुलंदियां सह न सकी
शगुफ्तगी की कमान
हाथों में मेरे रह न सकी |

सकता तो वो बरसता ही क्यूँ हम पर
छत हमारी ही क्यूँ गिरती हमपर |

कल ऐ दुनिया बारी हमारी आएगी
चेहरे पे हंसी हमारी आएगी,
कर लोगे क्या कर के दिखादो
एक दिन बारी हमारी आएगी, हमारी आएगी, हमारी आएगी |

Monday, March 14, 2016

असह्य दर्द (Unbearable pain - asahya dard)

आधे अधूरे से सच थे, पर झूठे न थे । 
तुम कुछ नाराज़ थे, पर रूठे न थे । 

एक अनजान झोंके ने, प्यार की डाल को ऐसा झूला दिया । 
लाख रोका, पर मुझको रुला दिया । 
आंधियाँ देखी थी कई उन्होंने,
पर चाहत के दरख़्त कभी टूटे न थे । 
तुम नाराज़ थे, पर रूठे न थे । 

इतने दर्द को देख आते जाते हर झोंके ने पूछा, "है सलामत ?"
जब कहते न बना तो जाने दिया उनको । 
कभी मेरे दिल के घाव इतने अनूठे न थे । 

नया क्या है इस टीस में क्यों पूछते हो । 
बेशक दिल दुखा, बेशक रोये । 
लोगों को पत्थर में भगवान मिलता है,
तो सोचते हैं किस्मत वाले हैं । 
मुझ अभागे को देख लो,
मैंने भगवान को वापस पत्थर बना दिया ।

मुड़ कर इतनी जल्दी तुम चल दिए,
अभी आँखों के आंसू ठीक से फूटे न थे । 
तुम कुछ नाराज़ थे, पर रूठे न थे । 

Friday, March 4, 2016

दर्द ढृढ़

दर्द है परीक्षा ।
दर्द है प्रतीक्षा ।
परीक्षित तू प्रतीक्षाशाली बन ।
प्रतीक्षित तू परीक्षाशाली बन ।
बोल मानव क्या है तेरी इच्छा ।

करले ढृढ़ खुद को ।
देख ले समय की सीमा को ।
नांप ले दूरी की परिसीमा को ।

जमा के दिल को ।
कर पत्थर झुलसने दे शरीर को ।
बुझ गयी आँखें तो क्या ।
कब तक बादल ढकेंगे रवि किरण को।

राह तेरी है ।
कौन ढोएगा तुझे उसपार फिर।
थकने दे अपने कदमों को ।

बोल मानव क्या है तेरी इच्छा ।
क्या करेगा अगले परीक्षा की प्रतीक्षा ।
क्या करेगा पूरी प्रतीक्षा की परीक्षा ।

Monday, February 29, 2016

कसक

मुस्कुराते अरमान जागते सोते हैं ।
कुछ अधूरे अनकहे से होते हैं ।
पसरे आसमान को एक टुक ताके पपीहा ।
पर बादल भी हर बार कहाँ रोते हैं ।

झाँक झरोखे की तारीफ़ कैसे करूँ ।
आप कभी कभार ही वहां होते हैं ।
ज़िद कर रहा हूँ आपसे ।
चलें मेरे साथ राह दर राह ।
मत पूछें 'कहाँ जाना है' हमसे ।
क्यूंकि कुछ राह के ही ठिकाने होते हैं ।

जलता हूँ उस हवा से ।
चिढ़ाती है जो हमें जान बूझ कर ।
कहे सांस बन आपके दिल तक है पहुँचती ।
जवाब देने की कसक पे मरहम लगा दें एक बार ।
बोल दें हमें एक बार ।
के हम आपके दिल में हमेशा होते हैं ।

Wednesday, February 24, 2016

ज़िन्दगी के रास्ते

ज़िन्दगी आसान रास्ते ढूंढती है ।
कई डगर चले हम ।
कई शहर चले हम ।
देखा तमाशा बायस्कोप जैसा ।
तेज़ रफ़्तार थी ।
चकाचौंध रोशनियों से सराबोर ,
हर ओर का समां था ।
चाह ऐसी थी के आसमां ही पा लेंगे ।
चलते रहे बस उस तरफ ,
जिधर की दिशा से आँखें सम्मोहित थीं ।
कांटे भी लगे , चोटें भी।
पर तब कुछ न होश था ।
थी तो सिर्फ एक होड़ और
धड़कनों में जोश था ।

दिन वो था जब ठोकर लगी , आँखें खुलीं ,
जैसे नींद से जागे हम और देखा ,
आसमां अब भी बित्ते भर दूर था ।
खूब रोये गाये थे हम ।
दिल को भी समझाए थे हम ।
के बस बोहोत हुआ ,
चलो वापस इस वीराने से ।

कुछ चले हम थके प्यासे से ।
कहीं एक पेड़ दिखा तो वहीँ रुक लिए ।
पेशानी से हटाया पसीना और
की आँखें बंद तो ये एहसास हुआ के
लौटना कितना दूभर है , और
ज़िन्दगी अब भी आसान रास्ते ढूंढ़ती है ।

Thursday, February 18, 2016

मतदाता की भावना

मरता क्या ना करता ।
चला में पैदल जहाँ थी भीड़, नंगे पाँव
पहनने को ना थी एक चप्पल ।

गिरा एक पानी भरे खड्डे में
ना थी ढंग की सड़क ।

उठा चला और लगा कतार में पसीने से तर ।
ना थी सर पर छाँव ।

रंगा कर अपनी उंगली काली सोचा मैं खड़ा ।
मतपत्र देख मेरा मत, "मत, मत कर" कहने लगा ।
एक कुआँ तो एक खाई ।
आँखें बंद कर प्रभु का नाम ले दबा दी एक बटन ।
मरता क्या ना करता ।

चुन लिया एक कुआँ वो भी सूखा
ना पानी है ना खाना ।
सिलसिला ये ही चला हर पाँच वर्ष
हर मतदान बस अगले की उमीद दे पता है
और कुछ नई करता
मैं बेचारा मरता क्या ना करता? 

Tuesday, February 16, 2016

हँसने की दुविधा

हँसना बुरी बात नहीं है । 
दिल से निकल कर चेहरे पे फूटती है, फ़व्वारे की तरह । 
और बखेर देती है खुशी चहुँ ओर । 

हँसना बुरी बात है । 
अगर सामने वाले की बुरी हालत देख निकल गयी हो । 
कोई वजूद नहीं ऐसी हँसी का । 

चलो आज अच्छी हँसी की बात करते हैं । 
जो तुम्हारे चेहरे पे होती है । 
जब तुम हँसते हो, तो मेरे दिल में बसते हो । 
इसी लिए जब तुम रोते हो तो मैं तुम्हारा सर 
अपने दिल से लगा लेता हूँ । 
इस उम्मीद में कि कुछ वोही मेरे दिल में बसी तुम्हारी हँसी 
फिर तुम्हारे चेहरे पे वापस आ जाये । 

मुझे तुमको हँसाना नहीं आता है 
अनाड़ी हूँ मैं । 
कभी मैं ना भी रहूँ पास ।
बस एक बार याद कर लो मेरा चेहरा 
और हँस दो, हँस दो, हँस दो । 
तो मुझे पता चल जायेगा । 
कैसे ?
क्यूंकि मेरे दिल को वो हंसी वापस मिल जाएगी 
और दिल अपने आप अच्छा हो जायेगा ।

Sunday, February 14, 2016

Akelapan (अकेलापन)

चादर की सिलवटों में छुपे, चन्द सच से हैं । 
इनमे उतनी ही सच्चाई है, 
जितनी मैंने दिल को कुरेद कर बताई थी तुम्हें । 
छोड़ तो दिया तुमने उन्हें वहीं पर ,
उन्ही चादर की सिलवटों में । 

बेख़याल बेसुध मेरी करवटों ने 
संजोये रखा है उन सिलवटों को ,
क्यूंकि वो अब भी मेरे लिए सच ही हैं । 

लफ्ज़ ही हमनफ़ज़ हैं अब तो । 
कभी वो मुझे बहलाते हैं, कभी मैं उनको । 

औने पौने ख़याल, टूटी फूटी बातें हैं । 
बेमतलब हैं या मुझे समझ नहीं आते हैं । 
उनका मतलब भी तो छुपा है वहीं ,
उन्हीं चादर की सिलवटों में ।

Thursday, February 11, 2016

Shayari 2

बेज़ार दिल किधर चला पता नहीं । 
बेकरार मन किधर चला पता नहीं । 

एक आवाज़ देकर बुला लो किसी बज़्म में । 
एक आग़ाज़ ही दे डालो मेरी अज़्म में । 

वार्ना मैं ठेहरा एक कठपुतलि । 
उसकी डोर का अंजाम ही डालो मेरे इल्म में ।

Tuesday, February 9, 2016

Shayari 1

"छलक ही न गई हो ज़रा सी जिनसे, वो पैमाने क्या बने ।
  ज़रा सी मनमानी न की तुमसे, तो दीवाने क्या बने ।"

किसी बात से रूठे हुए प्रेमी शिक़वा करते हुए ।

"बाअदबी की हद थी, के उनको जाने दे दिया ।
  बेअदबी की हद थी, के उन्होंने याद भी ना किया ।"

Monday, February 8, 2016

याद

इक जाम सा ही बना है मेरे हाथों में ।
मानो इक काम सा ही बना है मेरी सूनी रातों में ।

इक अनकही मुराद, इक अनसुनी फ़रियाद ।
उनका मुक़ाम सा ही बना है तुम्हारी यादों में ।

जाम ख़त्म होते हैं, काम ख़त्म होते हैं ।
पर यादें नहीं हैं जाती ।

उन्हीं को लिख लिख कर,
इक पैग़ाम सा बना है इन कागज़ातों में ।

Sunday, February 7, 2016

एक भटके राही की सोच

कहीं बेराह चले जा रहे हैं, कहीं बेराह चले जा रहे हैं ।
कुछ सामान तो है कंधे पर, है जाना कहाँ ये सुध नहीं ।
कहीं बेराह चले जा रहे हैं, कहीं बेराह चले जा रहे हैं ।

कहीं रौशनी सी दिखी थी कभी ।
चले काफी उसे देख पर ये न सोचा,
के वो मन्ज़िल का दिया नहीं, कोई जुगनू था ।
साथ चलता वो तो बस, कुछ चुराए किरणों की पोटली था ।
जब थक कर मद्धिम हो चली उसकी रौशनी,
तो कह दिया उसने,
राही तू चल मैं यहीं  रुकता हूँ ।

पर आगे तो अन्धेरा था ।
सो फिर से रोती किस्मत लिए, गुमराह चले जा रहे हैं ।
कहीं बेराह चले जा रहे हैं, कहीं बेराह चले जा रहे हैं ।

कभी धुंधलका सा हुआ तो रुक कर खोला सामानों का पिटारा ।
एक टूटी कलम, एक रुकी घडी,
और स्याही से सने कुछ पन्ने थे ।
काफी सोचा हमने पर समझ न आया,
के बीते लम्हों के चीथड़े किस चाह लिए जा रहे हैं ।
कहीं बेराह चले जा रहे हैं, कहीं बेराह चले जा रहे हैं ।

कभी कभी आँखें भी भरतीं हमारी।
"रोने से भला न होगा।"
कह कर दायीं आँख से फिसलते एक आँसू को रोका ।
आखिर था भी कौन वहाँ उनको पोछने वाला ?
ये सवाल भी आया था, अपने नमक के दाग लगे रुमाल को देख ।
सो बंद कर अपनी पोटली और आँखें भी ।
हर राह चुने जा रहे हैं ।
कहीं बेराह चले जा रहे हैं, कहीं बेराह चले जा रहे हैं ।

Friday, February 5, 2016

शुरुआत

हर सोच की एक शुरुआत होती है, पर माला की नहीं क्यूंकि हम उसके सिरे को नहीं खोज पाते ।
वैसे देखा जाये तो सोच के सिरे भी नहीं होते । उसके आगे और पीछे भी होता है । या तो कोई सच या कोई ख़याल ।

एक तरह से देखा जाये तो एक माला की भी शुरुआत होती है । वो पहला मोती या वो पहली लड़ी । जैसे जैसे मोतियों को पिरोते जाओ माला बड़ी होती है पर उसके फिर भी सिरे नहीं पनपते । माला कितनी बड़ी होगी ये मोती नहीं उसका धागा करता है । ठीक उसी तरह सोच कितनी दूर जाएगी ये सोच के सच और ख़याल नहीं उसे सोचने वाला तय करता है ।

काफी पेचीदा लगते हैं ये दो शब्द मुझे 'सोच' और 'माला' अब इसकी पेचीदगी भी तो शब्द नहीं मेरे ख़याल ही तय करते हैं । खैर पेचीदे हों या सुलझे एक बात तो है । इन दोनों शब्दों को एक साथ इस्तेमाल करना एक कश्मकश दर्शाता है । हर इंसान हर वक़्त किसी न किसी कश्मकश में रहता है । एक नमूना देता हूँ । सोचिए कभी तो आपके साथ ऐसा हुआ होगा कि आप किसी को बहुत समझाने कोशिश की  हो और वो आपकी बात समझे ही नहीं । तो आपको दुःख और कश्मकश एक साथ होता है । 
उसी पर एक शेर अर्ज़ है ।

'हमने तो खत में पूरी ज़िन्दगी लिख डाली, तुम थे के मज़्मूं ही न समझ पाये ।'

अब मुझे ही देख लीजिये कुछ ऐसा हुआ मेरे साथ के मैंने लिखना बस छोड़ ही दिया था । हाँ, कुछ दोस्त मज़ाक में ये ज़रूर बोलते थे के अच्छा ही हुआ, हमारे कान और दिमाग बच गए । पर मेरी सोच माला बड़ी होती गयी । अब मैं इस दुविधा में के फिर से कुछ लिखूं या नहीं । अब उसी का इलाज मुझे ये मिला कि मैं यहाँ अपने सोच की माला आज की भाषा में 'डाउनलोड' कर देता हूँ । अगर आपको पसंद आये तो शौक से इस माला के और मोती खोजिए और अगर ना आये तो 'इंटरनेट' या अंतरजाल पे पड़े कई सरफिरि चीज़ों कि तरह हँसिये और भूल जाइये । धन्यवाद ।