Thursday, March 24, 2016

हँस ले ऎ दुनियाँ

हमारे घर को असमान की बुलंदियां सह न सकी
शगुफ्तगी की कमान
हाथों में मेरे रह न सकी |

सकता तो वो बरसता ही क्यूँ हम पर
छत हमारी ही क्यूँ गिरती हमपर |

कल ऐ दुनिया बारी हमारी आएगी
चेहरे पे हंसी हमारी आएगी,
कर लोगे क्या कर के दिखादो
एक दिन बारी हमारी आएगी, हमारी आएगी, हमारी आएगी |

Monday, March 14, 2016

असह्य दर्द (Unbearable pain - asahya dard)

आधे अधूरे से सच थे, पर झूठे न थे । 
तुम कुछ नाराज़ थे, पर रूठे न थे । 

एक अनजान झोंके ने, प्यार की डाल को ऐसा झूला दिया । 
लाख रोका, पर मुझको रुला दिया । 
आंधियाँ देखी थी कई उन्होंने,
पर चाहत के दरख़्त कभी टूटे न थे । 
तुम नाराज़ थे, पर रूठे न थे । 

इतने दर्द को देख आते जाते हर झोंके ने पूछा, "है सलामत ?"
जब कहते न बना तो जाने दिया उनको । 
कभी मेरे दिल के घाव इतने अनूठे न थे । 

नया क्या है इस टीस में क्यों पूछते हो । 
बेशक दिल दुखा, बेशक रोये । 
लोगों को पत्थर में भगवान मिलता है,
तो सोचते हैं किस्मत वाले हैं । 
मुझ अभागे को देख लो,
मैंने भगवान को वापस पत्थर बना दिया ।

मुड़ कर इतनी जल्दी तुम चल दिए,
अभी आँखों के आंसू ठीक से फूटे न थे । 
तुम कुछ नाराज़ थे, पर रूठे न थे । 

Friday, March 4, 2016

दर्द ढृढ़

दर्द है परीक्षा ।
दर्द है प्रतीक्षा ।
परीक्षित तू प्रतीक्षाशाली बन ।
प्रतीक्षित तू परीक्षाशाली बन ।
बोल मानव क्या है तेरी इच्छा ।

करले ढृढ़ खुद को ।
देख ले समय की सीमा को ।
नांप ले दूरी की परिसीमा को ।

जमा के दिल को ।
कर पत्थर झुलसने दे शरीर को ।
बुझ गयी आँखें तो क्या ।
कब तक बादल ढकेंगे रवि किरण को।

राह तेरी है ।
कौन ढोएगा तुझे उसपार फिर।
थकने दे अपने कदमों को ।

बोल मानव क्या है तेरी इच्छा ।
क्या करेगा अगले परीक्षा की प्रतीक्षा ।
क्या करेगा पूरी प्रतीक्षा की परीक्षा ।